सुनो वीर भगत सिंह !

अडसठ वर्ष आजादी के होने को आये

पर गुलाम है स्वप्न आज भी तुम्हारा |

जो तुमने कभी सोचा नहीं

देखो हमने वो आज कर डाला ||

सुख – समृद्धि का सपना जो तुमने

गोरी हुकूमत में पाला – पोसा |

देखो हम वीर सपूतों ने

आज आजादी पाकर उसे मिटा डाला ||

भारत माता की जयकार पुकारते

तुम सूली पर चढ़ गए |

सोच रहे होगे तुम अवश्य,

क़ुरबानी व्यर्थ न जाएगी !

पर अब अडसठ वर्ष होने को आये हैं

तुम इतिहास में कहीं सिमट गए हो |

देखो हम कायरों को

वीरता तनिक भी क्यों न भायी?

बापू ने तुम्हें बचाया या नहीं

इस पर भीष्ण चिंतन करते हैं |

लालत है हम नौजवानों पर

कि उनको कभी हम समझ न सके ||

आधुनिकता की आड़ में अब हम

फिर गुलामी के लिए अग्रसर हो रहे हैं |

क्या आएगा दूजा भगत सिंह

जब माँ का ही मोल लगा बैठे हम ?

राजगुरु और सुखदेव मिलें कहीं तो,

कह देना तुम जाकर उनसे ।

आजादी तो अवश्य मिली थी

पर अपनों ने ही गुलाम बना डाला!

– मुकेश रावत, दिल्ली

  • (यह कविता उत्तराँचल पत्रिका में अक्टूबर 2015 को प्रकाशित हुई थी |)

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